Thursday, 21 January 2021

किसान क्रांन्ति : सरकार का दम्भ बनाम किसानों की मांग और सुप्रीम कोर्ट की दखल

रविकांत सिंह 'द्रष्टा'

एमएसपी के लिए एक कानून बनाने की बात पर किसान कायम

किसान आन्दोलन के 58 दिनों में 148 किसान अब तक शहीद हो चुके है। सरकार और लगभग 40 किसान संगठनों के प्रतिनिधियों के बीच 11 वें दौर की बैठक होनी है। 10 वें दौर की बातचीत के बाद केंद्रीय कृषि मंत्री नरेन्द्र सिंह तोमर ने कहा था कि सरकार ने एक से डेढ़ साल तक इन कृषि कानूनों को निलंबित करने का प्रस्ताव किसानों समक्ष रखा है। साथ ही उन्होंने कहा कि ‘जिस दिन किसानों का आंदोलन समाप्त होगा, वह भारतीय लोकतंत्र के लिये जीत होगी’। इससे पहले 12 जनवरी को सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में दखल देते हुए चार सदस्यों की समीति बनाई थी। जिस पर किसानों ने आपत्ति जताते हुए समीति के सदस्यों को पक्षपाती बताया था और कमेटी के समक्ष प्रस्तुत न होने का फैसला लिया था। अब 20जनवरी को मुख्य न्यायाधीश किसानों पर भड़कते हुए बोल रहे हैं कि ‘कमेटी के पास कोई पावर ही नहीं, तो वे पक्षपाती कैसे हो गये’? आप समीति के समक्ष पेश नहीं होना चाहते तो, हम आपको बाध्य नहीं करेंगे। लेकिन आप समीति पर आरोप नहीं लगा सकते हैं। किसानों का कहना है कि तीन केंद्रीय कृषि कानूनों को पूरी तरह रद्द करने और सभी किसानों के लिए सभी फसलों पर लाभदायक एमएसपी के लिए एक कानून बनाने की बात पर वह कायम हैं।

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‘द्रष्टा’ देख रहा है कि पूरजोर व पूरअमन तरीके से चल रहे किसान आन्दोलन-2020-21 के परिणाम की घोषणा होने वाली है। समय की परीक्षा में सरकार के मंत्री, किसान और सर्वोच्च न्यायालय शामिल हैं। किसानों का यह आन्दोलन नौजवान पीढ़ियों में जोश भर रहा है और खेती-किसानी में उन्हें जागरुक कर रहा है। किसानों को पहले आतंकवादी और नकली किसान बोलकर बेदिल, संकीर्ण मानसिकता के धनी, लोग उन पर थूक रहे थे। अब उन्हें आसमान पर थूकने का दण्ड मिल रहा है। पलटकर आसमान से गिरे अपने थूक को अब वे चाटने में लग गये हैं। कृषि बिल 2020 को सरकार के मंत्री अपनी निजी सम्पत्ति मानते हुए दुर्योधन की तरह हठ कर रहे हैं। अब हालत यह है कि जिन मंत्रियों के सिर किसानों के सामने झूकने को तैयार नहीं था अब वे कह रहे हैं कि दो साल के लिए हम अपना सिर झूका रहे हैं। सत्ताधीशों के गैर जिम्मेदाराना बयान किसानों को आक्रोशित कर रहा था। 



बंगाल चुनाव और 26 जनवरी को किसानों का दिल्ली में ट्रैक्टर मार्च की घोषणा, सरकार के मंत्रियों की धड़कने बढ़ा रही है। हरियाणा के मुख्यमंत्री मनोहरलाल खट्टर की किसानों ने धज्जियां उड़ा रखी है। उनकी रातों की नींद और दिन का चैन सब हराम हो रखा है। किसानों का कहना है कि हरियाणा के मुख्यमंत्री ने सरकार की तौहीन खुद कराई है।

'द्रष्टा' संवाददाता ने ‘किसानों का आक्रोश और खतरे में खट्टर सरकार’ नामक शीर्षक में सरकार को सचेत करने की कोशिश की थी। समाचार प्रकाशन के लगभग एक माह बाद प्रमुख विपक्षी दल कांग्रेस के नेताओं को समझ आया कि खतरे में है खट्टर सरकार। सत्ता और सत्ताधीश होने के दंभ ने मुख्यमंत्री को बेपरवाह बना दिया। वे नकली किसान सभाएं करने लगे। मुख्यमंत्री के इस चरित्र की जानकारी मिलते ही किसानों ने सभा का टेंट उखाड़ दिया। उनके सहयोगी पार्टी के विधायक बदहवास होकर सरकार गिराने की बात करने लगे। हरियाणा सीएम की केन्द्रिय नेताओं से वार्तालाप शुरु हो गयी। 

तीन नए कृषि कानूनों पर गतिरोध दूर करने के लिए बुधवार को मोदी सरकार द्वारा थोड़ी नरमी दिखाते हुए कानूनों को डेढ़ वर्ष तक निलंबित रखे जाने के प्रस्ताव को किसानों ने ठुकरा दिया है। लगभग साढ़े पांच घंटे चली 10वें दौर की वार्ता के बाद केंद्रीय कृषि मंत्री नरेन्द्र सिंह तोमर ने कहा कि सरकार और किसान संगठनों के प्रतिनिधि आपस में चर्चा जारी रख सकें और दिल्ली की विभिन्न  सीमाओं पर प्रदर्शन कर रहे किसान इस कड़ाके की ठंड में अपने घरों को लौट सकें। नरेन्द्र सिंह तोमर के इन बातों को बेअसर करते हुए किसानों ने यह आरोप भी लगाया कि सरकार न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) को कानूनी गारंटी देने पर चर्चा टाल रही है।
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सरकार का षड्यंत्र असली और नकली किसानों का भेद जानने के लिए था या कारपोरेट से किये वादे को निभाने की जिद। सरकार के मंत्री इस काम में फेल साबित हो रहे थे तो,केन्द्र सरकार सुप्रीम कोर्ट की शरण में चली गयी। सत्ता ने अपने नागरिकों को कोर्ट में घसीट कर चुनौती दी। सरकार के चाल-चलन से बाकायदा वाकिफ किसान नेताओं को ऐसी ही उम्मीद थी। दोनों पक्ष कोर्ट में भीड़ गये।

कोर्ट में मुख्य न्यायाधीश शरद अरविन्द बोबडे छाये रहे। नागरिक और सरकार के इस जंग में जजों ने न्यायायिक मर्यादा का ख्याल नहीं रखा। परन्तु, नागरिकों का यह आन्दोलन इस जज की इस गुस्ताखी को भी मान गया। ‘द्रष्टा’ विशेष समय पर उनके प्रत्येक वाक्यों का विश्लेषण करेगा। बहरहाल, सत्ताधीश और न्यायाधीश अपनी ताकत जनता जनार्दन को दिखाने में कामयाब हुए। सरकार ने अब डेढ़ साल के लिए कृषि कानून 2020 पर रोक लगाने का किसानों को प्रस्ताव भेजा है। जिसे किसान नेताओं ने खारिज करते हुए एमएसपी(न्यूनतम समर्थन मूल्य) कानून बनाने की मांग पर अड़े हुए हैं।


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Sunday, 10 January 2021

किसान क्रांति: आपको नागरिक से उपभोक्ता बनाने का षड्यंत्र

रविकांत सिंह 'द्रष्टा'

‘धर्म दा न साइंस दा, मोदी है रिलायंस दा’- भाग 1

-‘नागर’ शब्द का  संस्कृत में अर्थ है जो दूसरे के साथ रह सकता है। अर्थात् नागरिक वह है जो एक दूसरे के साथ रह सके। अगल-बगल, पास पड़ोस में नहीं बल्कि एक दूसरे के सूख-दुख में सहयोगी बनकर रहना ही नागरी जीवन है। 

-बाजार केवल आर्थिक लाभ-हानि को व्यापार का आधार मानता है न कि नागरिक मूल्यों को।

किसान और सरकार के बीच 8 वें दौर की बैठक खत्म हो चुकी है। 60 से अधिक किसानों की शहादत के बाद भी सरकार ने किसानों की मांग अब तक पूरी नहीं की है। इस मामले में सुप्रीम कोर्ट में 11 जनवरी को सुनवाई होनी है। वहीं किसानों के साथ बैठकों के बीच सरकार के मंत्री कृषि बिल 2020 को वापस न लेने की बात लगातार कर रहे हैं। इससे साफ जाहिर होता है कि किसानों के साथ सरकार की जो बैठक हो रही थी वह केवल प्रपंच है। षड्यंत्र में 6 प्रकार के प्रपंच होते हैं। द्रष्टा जानता है कि यह बैठकें तो, षड्यंत्रों का भंवर है जिसमें समूचे भारतीय नागरिकों को डूबा देने की शक्ति है। यह सारा सरकारी षड्यंत्र आपको नागरिक से उपभोक्ता बनाने की है। 

कृषि बिल 2020 का विरोध करने वाले किसानों का कहना है कि अपनी पूँजीवादी सोच की शक्ति से कारपोरेटर हमारे नागरिक अधिकारों का दमन कर कर रहे हैं और उपभोक्ता समझ रहे हैं। सरकार जानती है कि भारतीय नागरिकों की क्रय शक्ति क्या है? इसके बावजूद कारपोरेट के इशारे पर हमें असंतुलित बाजार में सरकार झोंक रही है। बेलगाम पूॅजीवादी प्रतियोगिता में हमें निचोड़ा जा रहा है। केंद्र से आया प्रस्ताव ठुकराने के साथ ही किसानों ने गौतम आडानी-अंबानी के खिलाफ भी मोर्चा खोल दिया है। किसानों ने अंबानी के पुतले जलाए, भारी संख्या में जियो के सिम तोड़ी और अपने नंबर अन्य नेटवर्क में पोर्ट करवाए हैं। ‘अखिल भारतीय किसान संघर्ष समन्वय समिति’ की तरफ से जारी प्रेस विज्ञप्ति में कहा गया है कि वे ‘सरकार की असली मजबूरी, अडानी-अंबानी जमाखोरी’ जैसे नारों को अब जन-जन तक पहुंचाने का काम करेंगे और इन दोनों कॉरपोरेट घरानों के तमाम प्रोडक्ट्स का बॉयकॉट पूरे देश में किया जाएगा।

‘द्रष्टा’ का मानना है कि हम किस वस्तु का उपभोग करेंगे यह प्रत्येक नागरिक का अपना अधिकार है। बाजार नागरिक की इच्छा के विपरित व्यवहार करता है। बाजारु लोगों की प्रकृति है कि वह हमें नागरिक न समझकर अपना उपभोक्ता समझते हैं। मानव सभ्यता फले -फूले इसके लिए मनुष्यों ने बाजार का निर्माण किया। मानव जीवन सरल और सुव्यवस्थित हो इसके लिए बाजार को संतुलित रखने व उच्च प्रबंधन पर जोर दिया। एक दूसरे से लेन-देन के लिए उत्पादित वस्तुओं का विनिमय अदला-बदली करना ही मानव के द्वारा शुरुआती व्यवसाय था। मानव सभ्यता के विकास के क्रम में उसने इसे जटिल बनाना शुरु कर दिया। जाहिर है मानव ने स्वार्थवश लोभ में आकर ऐसा किया है। और इस तरह लोभ और स्वार्थ को व्यवसाय से जोड़कर मानव ने एक गैर बराबरी वाली प्रतियोगिता की परम्परा बना दी। आज उसी परम्परा का विभत्स रुप आप देख रहे है। 

अडानी  और अंबानी ग्रुप को ही निशाना क्यों बना रहे हैं?


धर्म दा न साइंस दा, मोदी है रिलायंस दा’ पंजाबी भाषा में कहे गए इस नारे का मतलब है कि प्रधानमंत्री मोदी न तो धर्म से सरोकार रखते हैं और न ही विज्ञान से, वे सिर्फ रिलायंस (कॉरपोरेट) से सरोकार रखते हैं। इन दोनों कॉरपोरेट घरानों का ये विरोध सिर्फ नारों और सोशल मीडिया तक ही सीमित नहीं रहा है बल्कि पंजाब के कई शहरों में प्रदर्शनकारियों ने रिलायंस के पेट्रोल पंप से रिलायंस के तमाम स्टोर्स और अडानी ग्रुप के एग्रो आउटलेट्स का बहिष्कार किया है, मुकेश अंबानी के पुतले जलाए हैं और भारी संख्या में जियो के सिम तोड़े हैं और अपने नंबर किसी अन्य नेटवर्क में पोर्ट करवाए हैं। इसी तरह के विरोध को अब पूरे देश में फैलाने की बात किसान कर रहे हैं। किसान तमाम कॉरपोरेट घरानों में से सिर्फ अदाणी और अंबानी ग्रुप को ही निशाना क्यों बना रहे हैं? इस सवाल का जवाब देते हुए किसान नेता डॉक्टर दर्शन पाल कहते हैं, ‘ये सरकार पूरे देश को कॉरपोरेट के हवाले करने की दिशा में काम कर रही है। अडानी -अंबानी कॉरपोरेट के सबसे बड़े चेहरे हैं जो पिछले थोड़े ही समय में बहुत तेजी से आगे बढ़े हैं और मुख्य कारण यही है कि राजसत्ता और पूंजी साथ-साथ चल रहे हैं। ये दोनों ही ग्रुप मौजूदा सत्ता के बेहद करीब हैं और ये किसी से छिपा नहीं है।

इसके अलावा इन दोनों घरानों का नाम प्रतीकात्मक रूप से भी इस्तेमाल होता है। हमने इनके अलावा अन्य कॉरपोरेट घरानों का भी विरोध किया है जिसमें एस्सार ग्रुप जैसे नाम भी हैं। उनके पेट्रोल पंप का भी बहिष्कार पंजाब में हुआ है। ये विरोध किसी व्यक्ति या एक-दो कॉरपोरेट घरानों का नहीं बल्कि पूरे कॉपोर्रेट के हवाले जाते संसाधनों का विरोध है। इसलिए हमने सबसे से मांग की है कि कॉरपोरेट घरानों के तमाम उत्पादों और सेवाओं का बहिष्कार किया जाए।’


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इस रुप से द्रष्टा अनजान नहीं है। भारत ने सभ्यता के विकास में पूरे विश्व का मार्गदर्शन किया है। आज हम सतही बातों का समना कर रहे हैं। जो महत्वहीन है सभ्य तो, बिल्कुल नहीं। देश जब आजाद हुआ और हमने अपना संविधान बनाया तो, उसमें प्रान्तीय नागरिक नहीं बल्कि हम अखिल भारतीय नागरिक बने। ‘नागर’ शब्द का  संस्कृत में अर्थ है जो दूसरे के साथ रह सकता है। अर्थात् नागरिक वह है जो एक दूसरे के साथ रह सके। अगल-बगल, पास पड़ोस में नहीं बल्कि एक दूसरे के सूख-दुख में सहयोगी बनकर रहना ही नागरी जीवन है। यह सहअस्तित्व की बात है। उपभोक्ता के रुप में हमारी पहचान यह है कि हम स्वेच्छा से, अपनी मनपसन्द, जरुरत व सहुलियत के अनुसार वस्तुओं का उपभोग करते हैं। इस संदर्भ में हम उपभोक्ता है। जबकि व्यापारी अपनी सहुलियत के अनुसार ऐसे बाजार का निर्माण करते हैं जिनके उत्पाद में नागरिकों की कोई रुचि नहीं होती है। अधिकतर उत्पाद उनके क्रयशक्ति से बाहर के होते है। वह जिसे शुद्ध मानकर खरीदते हैं वह शुद्ध नहीं होता है। बाजार केवल आर्थिक लाभ-हानि को व्यापार का आधार मानता है न कि नागरिक मूल्यों को। इसलिए किसान नागरिक जियो रिलायंश, पतंजलि, गौतम अडानी और अम्बानी बन्धुओं का विरोध कर रहे हैं।

क्रमशजारी है....अगले भाग में

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Friday, 18 December 2020

बाटी-चोखा के बीच अखिल भारतीय पंचायत परिषद् में कृषि बिल और पंचायत की स्वायत्तता पर चर्चा

नयी दिल्ली/  द्रष्टा 

किसान आन्दोलन और केन्द्र सरकार के बीच सुप्रीम कोर्ट ने अपनी टांग अड़ा दी है। सुप्रीम कोर्ट ने 17 दिसम्बर को स्पष्ट कहा है कि किसानों को विरोध जारी रखना चाहिए लेकिन दिल्ली को ब्लॉक नहीं किया जा सकता है। चीफ जस्टिस एसए बोबडे, ने कहा कि इस मामले को एक समिति को सौंप दिया जाना चाहिए। समिति में कृषि की जानकारी रखने वाले स्वतंत्र सदस्य होने चाहिए जो कि दोनों पक्षों को सुनें और जो किया जाना है उस पर रिपोर्ट दें। कोर्ट ने कहा कि विरोध हिंसा के बिना जारी रह सकता है और पुलिस कुछ भी नहीं करेगी। अखिल भारतीय पंचायत परिषद् ने इस सुनवाई से पहले अपनी रणनीति बना ली थी। अखिल भारतीय पंचायत् परिषद् का कहना है कि संविधान के 73 वें सशोधन व 11 वीं अनुसूचि में स्पष्ट है। कृषि  व कृषि विस्तार पर चर्चा पंचायत (ग्राम सभा) का विषय है। लेकिन पक्ष- विपक्ष और केन्द्र व राज्य सरकारें अपने दलगत फायदे के लिए ग्राम सभा के अधिकारों पर चर्चा नहीं कर रही हैं।

इसी संदर्भ में सुप्रीम कोर्ट के निर्णय के बाद 18 दिसंबर को अखिल भारतीय पंचायत परिषद् ने बाटी -चोखा के साथ कृषि बिल पर चर्चा का आयोजन किया। गरमा-गरम बाटी चोखा के साथ अपने गॉंवो और उनके अधिकारों को याद करते हुए अखिल भारतीय पंचायत परिषद् के महामंत्री सत्येन्द्र सिंह व कानूनी विशेषज्ञ वरिष्ठ वकील वरुण सिन्हा ने पंचायतीराज और कोर्ट व सरकार की कार्यप्रणाली पर गम्भीरता से चर्चा की। श्री सिन्हा ने कहा कि ग्राम पंचायत में ज्यादातर किसान रहता है। जब लोकतांन्त्रिक तरीके से चुनी हुई ग्रामीणों की सरकार पंचायत है तो किसानों को अपना विधेयक खुद बनाना चाहिए और सरकार को भी उसे कंसीडर करना चाहिए। 


सवाल के जवाब में किसान नेता सत्येन्द्र सिंह ने कहा कि जब भारत की संसद ने पंचायतों के लिए संविधान बनाये तब उसमें 73 वें सविधान संशोधन की11 वीं अनुसूचि में स्पष्ट किया था कि कृषि कृषि विस्तार, भूमि, भूमि सुधार, मंडी बाजार और ग्रामीण रोजगार व आय आदि 29 विषयों पर योजना बनाना व लागू करने की जिम्मेदारी पंचायत को दी गयी थी।  और कानून बनाने की जिम्मेदारी संसद की है। जब वही लोग पंचायतों से न इस पर चर्चा किए और न ही संपर्क किए तो, क्या अपेक्षा करना कि पंचायतों को किसानों ने तवज्जो क्यों नहीं दिया?

सत्येन्द्र सिंह ने कहा कि आज से दो साल पहले किसानों की आमदनी दुगनी करने के लिए पंचायत और भारत सरकार की मंत्री परिषद् ने दो से तीन दिन का बड़ा सम्मेलन किया गया था। उस कार्यक्रम में हम लोगों ने देखा कि आमंत्रित लोगों की सूचि में कारपोरेट के लोग थे। खेती-बाड़ी से जुड़े व पंचायत के लोगों का जिक्र नहीं था। इस बात पर हम लोगों ने एक कड़ा पत्र भारत सरकार के पंचायत मंत्री को दिया था। जिसमें पंचायत मंत्री से आपत्ति प्रकट की गयी कि दूनियाभर से लोगों को आप बुलाए लेकिन खेती-बाड़ी कैसे हो? किसानों की स्थिति में क्या सुधार हो? इस पर किसानों को ही आपने चर्चा में शामिल नहीं किया। क्या भारत के संविधान को आप नहीं जानते हैं या आप जानबूझकर खेती-बाड़ी से जुड़े लोगों का सम्मान नहीं करते हैं?

सरकार बनाम पंचायत के कानूनी अधिकारों और उसकी जटीलताओं पर वरिष्ठ वकील वरुण सिन्हा ने मिर्जापुर के ग्राम पंचायत से जुड़े एक मुकदमें का जिक्र करते हुए कहा कि एक ग्राम पंचायत को नगर निगम में शामिल कर लिया गया। गांव के प्रधान ने सिंगल जज हाईकोर्ट इलाहाबाद के यहा मुकदमा किया जिसमें राज्य सरकर के वकील ने आपत्ति की, कि जब आप ग्राम प्रधान हैंं तों आपको राज्य सरकार की स्टैंडिंग कौंसिल से मुकदमा करवाना चाहिए न कि प्राईवेट वकील से। तो, उस व्यक्ति ने सरकारी वकील को कहा कि मैं ग्राम प्रधान अब नहीं हूँ जो ग्राम पंचायत थी उसे आप ने नगर निगम बना दिया। अब मैं गॉंव का एक साधारण सदस्य हूँ और मुझे अपना प्राईवेट वकील रखने का अधिकार है। यदि आप मुझे ग्राम प्रधान मानते है तो, भी ग्राम पंचायत का अपना वकील होगा न कि सरकारी वकील। ग्राम प्रधान ने दलील दी कि संविधान का 73 वॉ संशोधन हमें ‘स्थानीय स्वशासित सरकार’ का दर्जा देता है। लेकिन सिंगल जज ने कहा कि ग्राम पंचायत सरकार के खिलाफ मुकदमा नहीं लड़ सकती और यदि लड़ना होगा तों सरकारी वकील ही करना होगा और दलील को खारिज कर दिया। हाईकोर्ट के चीफ जस्टीस के पास जब यह मुकदमा पहुंचा तों, ग्राम प्रधान के वकील और सरकार के वकील के बीच काफी बहस हुयी। बहस को सुनने के बाद चीफ जस्टीस ने कहा कि पंचायत राज्य सरकार के अधीन है।

वरुण सिन्हा ने कहा कि 1992 से लेकर आज तक राज्य सरकार बीडीओ(ब्लॉक डेवलपमेंट आफिसर) सीडीओ(चीफ डेवलपमेंट आफिसर) डीएम (डिस्ट्रीक्ट मजिस्ट्रेट)के जरिए प्रभुत्व जमा बैठी है। और जो चुना हुआ जनप्रतिनिधि है चाहे वो ब्लॉक प्रमुख हो, जिला पंचायत सदस्य या ग्राम प्रधान सभी सरकारी अधिकारियों के अधीन हो जाते हैं। और जो जनप्रतिनिधि मालिक है वो नौकर बन जाता है और जो नौकर है वो मालिक बन जाता है यही वजह है कि केन्द्र व राज्य सरकार दोनों पंचायत को स्वायत्तता नहीं देना चहती है और न आप से संम्पर्क करना चाहती है। । यही लड़ाई केन्द्र व राज्य सरकार बनाम पंचायत है।   
कृषि बिल और पंचायतों की स्वायत्तता को लेकर मुखर रहने वाले पंचायत परिषद् के अध्यक्ष बाल्मीकी प्रसाद सिंह ने की चर्चा को सूनने के बाद कहा कि एक बार पंचायत मंत्री नरेन्द्र सिंह तोमर से मिलना चाहिए। मंत्री जी से मिलकर इन सवालों पर उनकी क्या राय है यह जानने की आवश्यकता है। 

पंचायत परिषद्के बाटी-चोखा कार्यक्रम में प्रोफेसर वी. एस. भदौरिया, वरिष्ठ वकील बिपुल मिश्रा, प्रदीप कुमार, डा. सुरेश कुमार, डा. केके रॉय, प्रहलाद सिंह, रविकांत सिंह, विजय पाण्डे, नीतु त्यागी, श्वेता ठाकुर, रचना शाही, करुणा त्यागी, अर्चना, दीपक, अजय सिंह चौहान,अमीर चन्द पटेल, राजेश वैद्य,राजन मदान, आदि सुप्रीम कोर्ट के वरिष्ठ वकील मौजूद थे।


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Tuesday, 15 December 2020

किसान क्रांति: पंचायत के संवैधानिक अधिकारों का दमन करती सरकारें

रविकांत सिंह 'द्रष्टा'

गरीबों के निवाले भी, सियासत छिन लेती है- 7

किसान नेता और सरकार दोनों को नहीं मालूम की संविधान के 73 वें संशोधन 1992 के अनुसार कृषि कृषि विस्तार से जुड़े मामले ग्राम सभा (पंचायत)का विषय है। संविधान की 11 वीं अनुसूची की 29 विषयों में स्पष्ट रुप से कृषि कृषि विस्तार शामिल है। लेकिन सरकार एक ही तीर से अपनी राजसत्ता और कारपोरेट को जनहितों से ऊपर रखकर पंचायतों किसानों के अधिकारों का दमन करना चाहती है।

केन्द्र सरकार द्वारा लाए गये कृषि बिल 2020 के उद्देश्यों उसके दूरगामी परिणामों पर वाद-विवाद का दौर जारी है। किसानों का मानना है कि सत्ता मेंं बैठे बेकार और नक्कारे किस्म के नेता और चाटुकार नौकरशाह हरामखोर पूॅजीपतियों के लिए संसाधन जुटा रहे हैं। कोरोना महामारी का भय दिखाकर केन्द्र सरकार राज्य सरकारें गैरजरुरी कामों को अंजाम देती गयीं। एक ओर गलत नियत वालों को बेहतर फायदा पहुंचाने के लिए किसानों की भलाई के नाम पर कृषि बिल 2020 को केन्द्र सरकार जबरन जनता पर थोपना चाहती है। वहीं दूसरी ओर पंचायतों को मिले संवैधानिक अधिकारों का अतिक्रमण भी कर दी। पंचायतीराज की विकेन्द्रित व्यवस्था को कुछ लोगों के हाथों में केन्द्रित कर रही है।

किसान क्रांति : प्रधानमंत्री का जुमला बना सरकार की फजीहत


द्रष्टाकृषि बिल 2020 के संबंध में जब अखिल भारतीय पंचायत परिषद् के अध्यक्ष बाल्मीकी प्रसाद सिंह से बातचीत करनी चाही तो उन्होंने गुस्से से अपने उद्गार प्रकट करते हुए कहा कि सरकार और आन्दोलित किसान नेता दोनों ही बेपटरी होकर फालतु की बहस में उलझे हैं। चुंकि इस बहस को पूरी दुनिया सुन रही है इसलिए उनकी बहसों से पूरा विश्व भ्रमित है। सरकार डर रही है कि विपक्षी राजनीतिक दलों के भ्रामक प्रचार में फंसकर किसान सत्ता परिवर्तन का दबाव बना रहे है। और किसान नेता डर रहे हैं कि इस कानून से पॅूजीपति किसानों की कृषि व्यापार को छिनकर जमीने हड़प लेंगे। और किसानों को उनके ही खेतों में गुलाम बना देंगे। किसान नेता और सरकार दोनों को नहीं मालूम की संविधान के 73 वें संशोधन 1992 के अनुसार कृषि कृषि विस्तार से जुड़े मामले ग्राम सभा (पंचायतका विषय है। संविधान की 11 वीं अनुसूची की 29 विषयों में स्पष्ट रुप से कृषि कृषि विस्तार शामिल है। लेकिन सरकार एक ही तीर से अपनी राजसत्ता और कारपोरेट को जनहितों से ऊपर रखकर पंचायतों किसानों के अधिकारों का दमन करना चाहती है।

संविधान की 11 वीं अनुसूची

1. कृषि, कृषि विस्तार सहित।

2. भूमि सुधार, भूमि सुधारों का कार्यान्वयन, भूमि समेकन औरं मिट्टी संरक्षण।

3. लघु सिंचाई, जल प्रबंधन और वाटरशेड विकास।

4. पशुपालन, डेयरी और मुर्गी पालन।

5. मत्स्य।

6. सामाजिक वानिकी और कृषि वानिकी।

7. लघु वनोपज।

8. खाद्य प्रसंस्करण उद्योगों सहित लघु उद्योग।

9. खादी, गाँव और कुटीर उद्योग।

10. ग्रामीण आवास।

11. पीने का पानी।

12. ईंधन और चारा।

13. सड़कें, पुलिया, पुल, घाट, जलमार्ग और संचार के अन्य साधन।

14. बिजली के वितरण सहित ग्रामीण विद्युतीकरण।

15. गैर-पारंपरिक ऊर्जा स्रोत।

16. गरीबी उन्मूलन कार्यक्रम।

17. प्राथमिक और माध्यमिक विद्यालयों सहित शिक्षा।

18. तकनीकी प्रशिक्षण और व्यावसायिक शिक्षा।

19. वयस्क और गैर-औपचारिक शिक्षा।

20. पुस्तकालय।

21. सांस्कृतिक गतिविधियाँ।

22. बाजार और मेले।

23. स्वास्थ्य और स्वच्छता, जिसमें अस्पताल, प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र और औषधालय शामिल हैं।

24. परिवार कल्याण।

25. महिला और बाल विकास।

26. विकलांगों और मानसिक रूप से मंद लोगों के कल्याण सहित सामाजिक कल्याण।

27. कमजोर वर्गों और विशेष रूप से अनुसूचित जातियों और अनुसूचित जनजातियों का कल्याण।

28. सार्वजनिक वितरण प्रणाली।

29. सामुदायिक संपत्ति का रखरखाव।

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अध्यक्ष बाल्मीकी प्रसाद सिंह ने आगे कहा कि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी पंचायती राज मंत्री नरेन्द्र सिंह तोमर आत्मनिर्भर भारत बनाना चाहते है। उनकी यह बात प्रशंसनीय  देशहित में है परन्तु, इसके लिए आत्मनिर्भर भारत बनाने का जो रास्ता है गॉवों से होकर गुजरता है। और गॉंवों की व्यवस्था गॉंव की सरकार पंचायती राज चलाती है। अखिल भारतीय पंचायत परिषद् पंचायतीराज की जनक संस्था है। जब-जब सरकार और अजागरुक जनता रास्ता भूल जाती है तब-तब अखिल भारतीय पंचायत परिषद् उनका मार्ग बताता रहा है। लगभग 2 दशक से जोरों पर सत्ता में बैठे नेता और नौकरशाह अपनी हरामखोरी की दुकान चलाने के लिए पूँजीपतियों से साठगॉंठ कर पंचायत के संवैधानिक अधिकारों का दमन कर रही हैं।
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द्रष्टादेख रहा है कि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी अपने दूसरे कार्यकाल में भी कारपारेट के पक्ष में स्पष्ट संकेत देते हुए किसानों को खुली चुनौती दे रहे हैं। लेकिन किसान राजनीतिक दल के नेताओं के मायाजाल में उलझता चला जा रहा है। किसान स्वामीनाथन आयोग की सिफारिशों कृषि बिल 2020 को रद्द करने की अपनी मागों पर नजर गड़ाये हैं लेकिन अपने संवैधानिक अधिकारों पर चर्चा नहीं कर रहे हैं। इसका परिणाम यह हो रहा है कि सरकार नाजायज तरीके से कानून बनाकर देश की आम आवाम पर थोपे जा रही है। कृषि बिल 2020 के तीनों विधेयकों के वापसी के लिए किसान दिल्ली पहुंचने का रास्ता रोककर बैठे हैं। सरकार के सिपाही और किसान दोनों लाठियां लेकर आमने-सामने खड़े है। किसान नेताओं और मंत्रियों के बीच कई दौर की चर्चा हो चुकी है। सरकारी तंत्र का प्रपंच और किसानों का जबाब दोनों की कार्यशैली को जानने वालों में यह चर्चाएं भ्रांति पैदा कर रही है।

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अखिल भारतीय पंचायत परिषद् के राष्ट्रीय सलाहकार रविकांत सिंह का कहना है कि ''यह केवल किसानो का मसला नहीं है बल्कि देश के आम नागरिकों को आर्थिक समस्यायों में उलझने का मामला है ।  सरकार जो आज चन्द किसान नेताओं को ठेके पर बुलाकर कृषि बिल पर जो चर्चा कर रही है वही पहले ग्राम सभा से चर्चा करके कृषि बिल तैयार करती तो आज किसान आन्दोलन होता और ही हजारों करोड़ रुपये की आर्थिक क्षति पहुंचती। लगता है सत्ता को जनता पर भरोसा नहीं है इसलिए वह जबरन ग्राम सभा के संवैधानिक अधिकारों का हनन कर रही है।'' रविकांत सिंह ने आगे कहा कि ''अब भी सरकार की नियत किसानों को फायदा पहुंचाने की है तो, कम से कम एक कृषि कानून आवश्यक वस्तु अधिनियम एक्ट 1955 को यथास्थिति रखते हुए ग्राम सभा के बीच जाना चाहिए। और अखिल भारतीय पंचायत परिषद् को निगरानी की जिम्मेदारी देनी चाहिए। ग्राम सभा के हित में जो होगा वह वैसा कानून बनाने का प्रस्ताव दे देगी। इससे पंचायतीराज के संवैधानिक अधिकारों का भी दमन नहीं होगा''।

बहरहाल,पंचायती राज मंत्री नरेन्द्र सिंह तोमर किसानों के मसले पर बेहतर अनुभव रखने वाले नेता नीतिन गडकरी को अब अखिल भारतीय पंचायत परिषद् को शामिल कर लेना चाहिए। कृषि बिल 2020 को ग्राम सभाओं से पास कराकर ही संसद को कानून बनाना चाहिए यही एक मात्र किसान आन्दोलन को रोकने की कारगर व्यवस्था है'।

                                        क्रमशजारी है....अगले भाग में

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